अफसाना Hindi Poem

Afsana Hindi Poem

Beautiful Hindi Poem

अफसाना

बीते ग़मों के साए में

पनप रही जिंदगानी थी,

बंद पड़े पन्नों की

खिड़कियों से झांक रही तनहाई थी,

सुलगते से अफसाने थे जिनमें

जमाने की रुसवाई थी ,

जज्बातों के समंदर में जो डूबा

अल्फाजों की मोती निकल आई थी,

रू ब रू हुए जज्बों से तो

बयां में कितनी गहराई थी,

जमाने के तंग ख्यालातो से

अक्स कैसी वो मुरझाई थी,

अफसानों के साए में घिर बंद

पिंजड़ा के परिंदों सी घबराई थी,

गुजरे वक्त की जन्नत-ए-हुस्न

लट उलझाए अदाओं से शरमाई थी,

होकर बेपरवाह दर्पण में देखा तो

तस्वीर भी उसकी मुस्कुराई थी,

खयालों में उसके खोया तो

नग्मों और नज्मों से तारीफों की भरपाई थी,

वक्त की गोद में गुमराह हुई

ये जमाने की कैसी सच्चाई थी,

बीते ग़मों के साए में पनप रही जिंदगानी थी,

बंद पड़े पन्नों की खिड़कियों से

झांक रही तनहाई थी

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