गुलजार साहब की बेतरीन शायरी Best Gulzar Shayari in Hindi

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गुलजार साहब की बेतरीन शायरी Best Gulzar Shayari in Hindi

बहुत मुश्किल से करता हूं तेरी यादों का कारोबार
मुनाफा कम है लेकिन गुजारा हो ही जाता है

उम्र कहती है अब संजीदा हुआ जाए
दिल कहता है कुछ नादानियां और सही

मैं हर रात अपनी ख्वाहिशों को खुद से पहले सुला देता हूं
हैरत यह है कि हर सुबह यह मुझसे पहले जाग जाती है

यूं तो भीड़ काफी हुआ करती थी महफिल में मेरी
फिर मैं बोलता गया और लोग उठते गए

चेहरा देखकर इंसान पहचानने की कला थी मुझ में
तकलीफ तो तब हुआ इंसानों के पास चेहरे बहुत थे

बिना मोबाइल खाली हाथ नजर आए कोई तो
खामखा हाथ मिलाने का जी करता है

कुछ पल बैठा करो बुजुर्गों के साथ
हर चीज गूगल पर नहीं मिलती

Gulzar Quotes on zindagi

घुटन क्या चीज है पूछिए उस बच्चे से
जो काम करता है रोटी के लिए खिलौनों के दुकान पर

खाली पड़ा है मेरे पड़ोस का मैदान
एक मोबाइल बच्चों की गेम चुरा ले गया

उलझन ने भी मीठी हो सकती है
जलेबी इस बात की जिंदा मिसाल है

अर्थी बनाने वाले ने बड़े दुख से कहा
लोग मरते हैं इसीलिए मेरा परिवार जिंदा है

सुना था लोगों से कि वक्त भी बदलता है
वक्त ने बताया कि लोग भी बदलते हैं

स्वास के साथ अकेला चल रहा था
स्वास गई तो सब साथ साथ चलने लगे

कभी-कभी धागे बहुत कमजोर चुन लेते हैं हम
और फिर पूरी उम्र दा में ही निकल जाती है

जब गिला शिकवा अपनों से हो तो खामोशी ही भली
अब हर बात पर जंग हो यह जरूरी तो नहीं

चूम लेता हूं मैं हर मुश्किल को अपना मान कर
जिंदगी आखिर कैसे भी है आखिर है तो मेरी

Gulzar sahab shayari on life in hindi

कुछ जख्मों की कोई उम्र नहीं होती ताउम्र साथ चलते हैं
जिस्म के खाक होने तक

लोग कहते हैं समझो तो खामोशियां भी बोलती है
मैं अरसो से खामोश हूं वह बरसों से बेखबर है

कुछ रिश्तो में मुनाफा नहीं होता
पर जिंदगी को अमीर बना देते हैं

यूं ही नहीं होती जनाजे में भीड़
हर शख्स अच्छा है बस चले जाने के बाद

आज वही कल है जिस कल की फिकर तुझे कल थी

सिर्फ सुकून ढूंढिए जरूरतें तो कभी खत्म नहीं होती

तू बिल्कुल चांद की तरह है नूर भी गुरूर है दूर भी

मुझे क्या तुम्हें क्या हमें क्या
और फिर रिश्ते धीरे-धीरे खत्म

उम्र जाया कर दी लोगों ने औरों में नुस्खे निकालते निकालते
इतना खुद को तराशा होता तो फरिश्ते बन जाते

Best Gulzar Shayari in Hindi

बहुत छाले हैं उसके पांव में
कमबख्त जिंदगी भर उसूलों पर चला होगा

रूठती हमेशा खुशियां ही हैं
दुखों के कहां इतने नखरे होते हैं

अक्सर वही दीए हाथों को जला देते हैं
जिनको हम हवा से बचा रहे होते हैं

सब अपने से लगते हैं लेकिन सिर्फ बातों से

मैं दिया हूं मेरी दुश्मनी तो सिर्फ अंधेरों से है
हवा तो बेवजह ही मेरे खिलाफ है

वक्त रुकता नहीं कहीं टिक्कर
आदत इसका भी आदमी सी है

कोई वकालत नहीं चलती जमीन वालों की
जब कोई फैसला आसमा से उतरता है

कुछ लोग काफी गरीब होते हैं
उनके पास दौलत के अलावा कुछ नहीं होता

थोड़ा सा रफू करके देखिए तो फिर से नई सी लगेगी
जिंदगी ही तो है

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