वक़्त Hindi poem on waqt

Hindi poem on waqt

वक़्त

वक्त ने ली ऐसी करवट क्यों

लब खामोश से हो गए क्यों

जज्बातों पर यूं बंदिश लगी

कोहराम दिल में मचलने लगी

फासले दरमियां ज्यूँ बढ़ गए

जन्मों के वादे कहां खो गए

धुआं सा हो चला है परवाना

समा भी जैसे चाहे पिघलना

क्यों नजर खामोश से हो चले

बिन कहे अल्फाज दिल के बयां कर चले

तूफानों से लड़कर ना मिला किनारा

मांझी को नैया मिले दिखे जो अक्सर तुम्हारा

ख्वाबों का आशियाना बना ले जरा

मिन्नतों से भी ना मिलती जिंदगी दोबारा

कहीं वक्त न बना ले चादर को कफ़न

खिली ख्वाहिशें ना हो जाए दफन

उम्मीदों का दामन न छूट जाए कहीं

जिंदगी का सफर न रुक जाए यही

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