जानिए क्या है मार्कंडेय पुराण और उसकी कथा Markandeya Purana in Hindi

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जानिए क्या है मार्कंडेय पुराण और उसकी कथा Markandeya Purana in Hindi

Markandeya Purana in Hindi: महर्षि ब्यास जी ने मानव कल्याण के लिये नैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक विषयों से परिपूर्ण इस पुराण की रचना की है। इस पुराण को जैमिनी ऋषि मार्कण्डेय जी से प्रश्न पूछते हैं जिसका समाधान मार्कण्डेय जी करते हैं। मार्कण्डेय ऋषि द्वारा कथन किये जाने से इसका नाम मार्कण्डेय पुराण पड़ा। इस पुराण में चण्डी देवी का महात्मय विस्तार पूर्वक वर्णन है। दुर्गा सप्तशती मार्कण्डेय पुराण का ही एक अंश है। दूर्गा सप्तसती का भारत वर्ष के वैष्णव, शाक्त, शैव आदि जितने भी सम्प्रदाय के लोग हैं, बड़ी श्रद्धा से पाठ करते हैं। वर्तमान में मार्कण्डेय पुराण में 137 अध्याय एवं 9 हजार श्लोक विद्यमान हैं।

विभिन्न उपाख्यान एवं महात्मय से भरे हुये इस पुराण में राजा हरीशचन्द्र का उपाख्यान बहुत करूण एवं मार्गिक प्रसंग है। सत्य की रक्षा के लिये राजा हरीशचन्द्र ने न केवल अपना राज्य धन, ऐश्वर्य अपितु पुत्र एवं पत्नी को भी बेच दिया एवं स्वयं ऋषि विश्वामित्र की दक्षिणा पूरी करने के लिये श्मशान में चाण्डाल बनकर सेवा करने लगे। मदालसा का चरित्र इस पुराण में विशेष रूप से उल्लिखित है।

मार्कण्डेय पुराण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग दुर्गा सप्तशती है। जिसमें माँ भगवती के तीन चरित्रों का वर्णन है। जिसमें प्रथम चरित्र में सुरथ नामक राजा शत्रुओं तथा दुष्ट मंत्रियों के कारण राज्य एवं धन हाथ से निकल जाने पर वन में आ गया और मेघा ऋषि के आश्रम पर रहने लगा। वहाँ उसकी भेंट समाधि नामक वैश्य से हुई। इस चरित्र में सुरथ एवं      समाधि वैश्य का संवाद है। मध्यमचरित्र में महिषासुर वध की अद्भुत कथा का वर्णन है। उत्तम चरित्र में शुम्भ-निशुम्भ दो पराक्रमी दानव, जिन्होंनें इन्द्रादि देवताओं को युद्ध में हराकर उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया और स्वयं त्रिलोकी के अधिपति बन गये। इस चरित्र में माँ भगवती ने धूम्रलोचन वध, चण्ड-मुण्ड वध, रक्तबीज एवं शुम्भ-निशुम्भ दोनों को मारकर त्रिलोकी को इन असुरों के आक्रान्त से बचाकर देवताओं को त्रिलोकी का साम्राज्य वापिस दिलवाया।

मार्कण्डेय ऋषि की कहानी

मृगश्रृंग नाम के एक ब्रह्मचारी थे। उनका विवाह सुवृता के संग संपन्न हुआ। मृगश्रृंग और सुवृता के घर एक पुत्र ने जन्म लिया। उनके पुत्र हमेशा अपना शरीर खुजलाते रहते थे। इसलिए मृगश्रृंग ने उनका नाम मृकण्डु रख दिया। मृकण्डु में समस्त श्रेष्ठ गुण थे। उनके शरीर में तेज का वास था।पिता के पास रह कर उन्होंने वेदों के अध्ययन किया। पिता कि आज्ञा अनुसार उन्होंने मृदगुल मुनि की कन्या मरुद्वती से विवाह किया।

मार्कण्डेय ऋषि का जन्म

मृकण्डु जी का वैवाहिक जीवन शांतिपूर्ण ढंग से व्यतीत हो रहा था। लेकिन बहुत समय तक उनके घर किसी संतान ने जन्म ना लिया। इस कारण उन्होंने और उनकी पत्नी ने कठोर तप किया। उन्होंने तप कर के भगवन शिव को प्रसन्न कर लिया। भगवान् शिव ने मुनि से कहा कि,
“हे मुनि, हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं मांगो क्या वरदान मांगते हो”?

तब मुनि मृकण्डु ने कहा,
“प्रभु यदि आप सच में मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे संतान के रूप में एक पुत्र प्रदान करें”।
भगवन शंकर ने तब मुनि मृकण्डु से कहा की,
“हे मुनि, तुम्हें दीर्घ आयु वाला गुणरहित पुत्र चाहिए। या सोलह वर्ष की आयु वाला गुणवान पुत्र चाहते हो?”
इस पर मुनि बोले,
“भगवन मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जो गुणों कि खान हो और हर प्रकार का ज्ञान रखता हो फिर चाहे उसकी आयु कम ही क्यों न हो।”

भगवान् शंकर ने उनको पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया और अंतर्ध्यान हो गए। समय आने पर महामुनि मृकण्डु और मरुद्वती के घर एक बालक ने जन्म लिया जो आगे चलकर मार्कण्डेय ऋषि के नाम से प्रसिद्द हुआ।

महामुनि मृकण्डु ने मार्कण्डेय को हर प्रकार की शिक्षा दी। महर्षि मार्कण्डेय एक आज्ञाकारी पुत्र थे। माता-पिता के साथ रहते हुए पंद्रह साल बीत गए। जब सोलहवां साल आरम्भ हुआ तो माता-पिता उदास रहने लगे। पुत्र ने कई बार उनसे उनकी उदासी का कारण जानने का प्रयास किया। एक दिन महर्षि मार्कण्डेय ने बहुत जिद की तो महामुनि मृकण्डु ने बताया कि भगवन शंकर ने तुम्हें मात्र सोलह वर्ष की आयु दी है और यह पूर्ण होने वाली है। इस कारण मुझे शोक हो रहा है।

ऋषि श्री मारकंडेश्वर महादेव

इतना सुन कर मार्कण्डेय ऋषि ने अपने पिता जी से कहा कि आप चिंता न करें मैं शंकर जी को मना लूँगा और अपनी मृत्यु को टाल दूंगा। इसके बाद वे घर से दूर एक जंगल में चले गए। वहां एक शिवलिंग स्थापना करके वे विधिपूर्वक पूजा अर्चना करने लगे। निश्चित समय आने पर काल पहुंचा।

महर्षि ने उनसे यह कहते हुए कुछ समय माँगा कि अभी वह शंकर जी कि स्तुति कर रहे हैं। जब तक वह पूरी कर नही लेते तब तक प्रतीक्षा करें। काल ने ऐसा करने से मना कर दिया तो मार्कण्डेय ऋषि जी ने विरोध किया। काल ने जब उन्हें ग्रसना चाहा तो वे शिवलिंग से लिपट गए। इस सब के बीच भगवान् शिव वहां प्रकट हुए। उन्होंने काल की छाती में लात मारी। उसके बाद मृत्यु देवता शिवजी कि आज्ञा पाकर वहां से चले गए।

मार्कण्डेय ऋषि की श्रद्धा और आस्था देख कर भगवन शंकर ने उन्हें अनेक कल्पों तक जीने का वरदान दिया। अमरत्व का वरदान पाकर महर्षि वापस अपने माता-पिता के पास आश्रम आ गए और उनके साथ कुछ दिन रहने के बाद पृथ्वी पर विचरने लगे और प्रभु की महिमा लोगों तक पंहुचाते रहे।

इस तरह भगवान् पर विश्वास कायम रख कर मार्कण्डेय ऋषि ने एक ऐसी उदाहरण दी जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। उनके नाम पर श्री मार्कण्डेश्वर मंदिर परिसर धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र मारकण्डा नदी के तट पर नेशनल हाईवे नंबर 1 के समीप विद्यमान है। यह परिसर 8 एकड़ में फैला हुआ है।

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