समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों का रहस्य और उनके पीछे छिपे अर्थ

Samundra Manthan Full Story

Samundra Manthan Full Story in Hindi :- 

दोस्तों भारतीय पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी त्रयोदशी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार भगवान धनवंतरी इसी दिन समुंद्र मंथन से प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन भगवान धन्वंतरि का विशेष पूजा अर्चना की जाती है। दोस्तों समुंद्र मंथन से भगवान धनवंतरी के अलावा और भी 14 रत्नों की उत्पत्ति हुई थी। आज हम आपको अपने इस पोस्ट में समुद्र मंथन की पूरी कथा Samundra Manthan Full Story और साथ ही साथ उससे से निकले 14 रत्नों के बारे में भी बताएंगे और उस में छुपे लाइफ मैनेजमेंट सूत्रों के बारे में भी बताएंगे।

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समुंद्र मंथन की कथा Samundra Manthan Full Story in hindi

दोस्तों हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण स्वर्ग और उसमें रहने वाले सारे देवता श्रीहीन हो गए थे अर्थात ऐश्वर्य,धन,वैभव आदि से हिन हो गए थे। तब स्वर्ग के सारे देवताओं में खलबली मच गई और वह इस समस्या को सुलझाने के लिए भगवान श्री हरि विष्णु जी के पास गए। तब भगवान श्री हरि विष्णु जी ने स्वर्ग के सारे देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया। और उन्होंने यह भी बताया कि समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा जिसे पीकर तुम सब अमर हो जाओगे ।यह बात स्वर्ग के देवताओं ने जाकर असुरों के राजा बलि को बताई तो असुरों के राजा बलि ने समुंद्र मंथन से निकलने वाले अमृत की बात सुनकर वह भी देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गया।  तब स्वर्ग के देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन करना प्रारंभ किया। वासुकि नाग को डोरी बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथने का काम शुरू हुआ। दोस्तों समुंद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा,ऐरावत हाथी,माता लक्ष्मी सहित 14 रत्न निकले।

क्या शिक्षा मिली

दोस्तो लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से समुंद्र मंथन को देखा जाए तो हम सब पाएंगे कि सीधे सीधे किसी भी इंसान को अमृत (परमात्मा) की प्राप्ति नहीं होती। उसके लिए सबसे पहले हम सब को अपने मन के विकारों को दूर करना पड़ता है। और अपनी इंद्रियों को अपने नियंत्रण में रखना पड़ता है दोस्तों समुद्र मंथन में 14 अर्थात अंतिम नंबर पर अमृत निकला था। दोस्तों इसका अर्थ है:- पांच कमेन्द्रियां,पांच जनेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं:-मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार। दोस्तों हम सब को इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में ही परमात्मा रुपी अमृत की प्राप्ति होती है। Samundra Manthan Full Story

1  कालकूट विश्व

दोस्तों समुंद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट नाम का विष निकला था। विष को देखकर सारे देवता और असुर काफी डर गए थे। तब संसार की रक्षा करने हेतु भगवान शिव ने उस भयंकर कालकूट विष को ग्रहण कर लिया। इसका अर्थ है की अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में ही स्थित होते हैं। अगर हम सबको परमात्मा रुपी अमृत की इच्छा है। तो सबसे पहले हम सबको अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम सब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले हमारे अंदर से बुरे विचार अर्थात विष ही बाहर निकलेगा। हम सभी को इन सभी बुरे विचारों को अपने परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इस से मुक्त हो जाना चाहिए।

2 कामधेनु

समुंद्र मंथन करने में दूसरे नंबर पर निकली कामधेनु गौ। वह अग्निहोत्र यज्ञ की सामग्री उत्पन्न करने वाली गाय थी। इसलिए कामधेनु गांव को ब्रह्मवादी ऋषि मुनियों ने उसे ग्रहण कर लिया। दोस्तों कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता का। क्योंकि किसी भी इंसान के अंदर से बुरे विचार निकल जाने पर उसका मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस इंसान को ईश्वर परमात्मा तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है।

3 उच्चैश्रवा घोड़ा

समुंद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। जिसका रंग सफेद था। इस घोड़े को असुरों के राजा बलि ने ग्रहण किया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। दोस्तों दुनिया में मन की गति को ही सबसे अधिक मानी गई है। अगर आप अमृत रूपी परमात्मा की प्राप्ति चाहते हैं तो आपको अपनी मन की गति पर विराम लगाना होगा। तभी आपको परमात्मा की प्राप्ति संभव हो पाएगी।

4 ऐरावत हाथी

समुंद्र मंथन के क्रम में चौथ के नंबर पर ऐरावत हाथी निकला था। ऐरावत हाथी के 4 बड़े बड़े दाग थे। जिसकी चमक कैलाश पर्वत से भी अधिक थी। ऐरावत हाथी को देवराज इंद्र ने अपने पास रख लिया।  दोस्तों एरावत हाथी प्रतीक है बुद्धि का। और उसके चार दांत लोभ,मोह,वासना और क्रोध का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोस्तों शुद्ध व निर्मल बुद्धि से ही हम सब इन विकारों पर काबू रख सकते हैं। और भगवान की प्राप्ति कर सकते है।

5 कौस्तुभ मणि

समुंद्र मंथन के पांचवें क्रम में कौस्तुभ मणि निकला था। जिसे भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने हृदय पर धारण कर लिया। दोस्तों कौस्तुभ मणि प्रतीक है भक्ति का। जब आप के मन से सारे विकार निकल जाएंगे तब  आपके मन में भक्ति ही शेष रह जाएगी। यहीं भक्ति हम सबके भगवान अर्थात परमात्मा ग्रहण करेंगे। Samundra Manthan Full Story

6 कल्पवृक्ष

समुंद्र मंथन के छठे के क्रम में निकला था दोस्तों सारी इच्छाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष। जिसे स्वर्ग के देवताओं ने मिलकर स्वर्ग में स्थापित कर दिया। दोस्तों कल्पवृक्ष प्रतीक है हम सबकी इच्छाओं का। कल्पवृक्ष से जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट का सूत्र कहता है- अगर आप अपने जीवन में परमात्मा रूपी अमृत को प्राप्त करना चाहते हैं,तो आप अपनी सभी इच्छाओं का त्याग कर दीजिये। अगर मन मे इच्छाएं होगी तो आप परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते।

7 रंभा अप्सरा

समुंद्र मंथन के सातवे  क्रम में रंभा नाम की अप्सरा निकली थी जो बहुत ही सुंदर थी। वह सुंदर वस्त्र और आभूषण पहने हुए थी। उसकी चाल मन को लुभाने वाली थी। रंभा अप्सरा को भी देवताओं ने अपने पास ही रख लिया। दोस्तों अप्सरा प्रतीक है इंसान के मन में छुपी वासना का। जब कभी भी हमसब किसी विशेष काम में लगे होते हैं। तब हम सबके अंदर वासना आकर हम सबका मन विचलित करने का प्रयास करती है। उस स्थिति में  हम सब को अपने मन के पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।

8 देवी लक्ष्मी

समुंद्र मंथन के आठवें स्थान पर निकली थी देवी लक्ष्मी। देवी लक्ष्मी को देखते ही असुर देवता और ऋषि मुनि सभी चाहते थे कि लक्ष्मी उन्हें मिल जाएं। लेकिन देवी लक्ष्मी ने भगवान श्री हरि विष्णु को पति रूप में स्वीकार कर लिया। दोस्तो लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो लक्ष्मी प्रतीक हैं धन,वैभव, ऐश्वर्य व अन्य संसारिक सुखों का।जब हम सब परमात्मा रुपी अमृत को प्राप्त करना चाहते हैं। तो सांसारिक सुख भी हमें अपनी ओर खींचते हैं।लेकिन हम सब को उस ओर ध्यान ना देकर केवल परमात्मा की भक्ति में ही ध्यान लगाना चाहिए,तभी हम सबको अमृत (परमात्मा) प्राप्त हो सकते हैं

9 वारुणी देवी

समुद्र मंथन के नौवें क्रम में निकली थी वारुणी देवी। सभी देवताओं की अनुमति से इसे असुरों ने ले लिया। दोस्तों वारुणी का अर्थ होता है मदिरा यानी नशा। यह भी एक बुराई है। दोस्तों इंसान में नशा कैसा भी हो संसार और समाज के लिए वह बुरा ही होता है। अगर हम सबको परमात्मा को पाना है तो हम सब को सबसे पहले नशा छोड़ना होगा। तभी हम सबको परमात्मा की प्राप्ति अर्थात उनसे साक्षत्कार संभव हो सकता है

10 चंद्रमा

समुद्र मंथन के दसवें क्रम में चंद्रमा निकला। जिसे भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। दोस्तों चंद्रमा का प्रतीक है- शीतलता का। जब हम सबके मन से बुरे विचार,लालच,वासना,नशा आदि से मुक्त हो जाएगा। तब हम सबका मन चंद्रमा की तरह शीतल हो जाएगा। परमात्मा को पाने के लिए हम सब के पास ऐसे ही मन की आवश्यकता है। ऐसे ही मन वाले भक्तों को परमात्मा रुपी अमृत प्राप्त होता है। Samundra Manthan Full Story

11 पारिजात वृक्ष

समुंद्र मंथन के 11वें क्रम में पारिजात वृक्ष निकला। पारिजात वृक्ष की विशेषता थी की इसे छूने से ही शरीर की सारी थकान मिट जाती थी।पारिजात वृक्ष को भी देवताओं ने अपने पास ही रख लिया। समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष निकालने का अर्थ है:-किसी भी मनुष्य को सफलता प्राप्त होने से पहले मिलने वाली शांति की है। जब हम परमात्मा के निकट पहुंचते हैं,तो हमारी थकान मिट जाती है। और हम सबके मन में शांति का एहसास होता है।

12 पांचजन्य शंख

दोस्तों समुंद्र मंथन से बारहवीं क्रम में पांचजन्य शंख निकला था। इस शंख को भगवान श्री हरि विष्णु ने ग्रहण किया। दोस्तों शंख को विजय का प्रतीक माना गया है। इसके साथ ही शंख की ध्वनि बहुत ही ज्यादा शुभ मानी गई है। हमारे पुराण कहते हैं कि जब हम सब परमात्मा रुपी अमृत से एक कदम की दूरी पर होते हैं, तो मन का खालीपन ईश्वरीय नाद( भक्ति)  स्वर से भर जाता है। और ऐसी स्थिति में जाकर हम सबको परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

13 व 14 भगवान धन्वंतरि व अमृत कलश

दोस्तों समुंद्र मंथन से सबसे अंत में भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले थे। लाइफ मैनेजमेंट की  दृष्टिकोण से कहा जाए- तो भगवान धनवंतरी प्रतीक हैं निरोगी तन व निर्मल मन का।  दोस्तों जब हमसब का तन निरोग और मन निर्मल होगा। तभी हम सबको परमात्मा की प्राप्ति होगी।

समुंद्र मंथन में 14 नंबर पर अर्थात सबसे अंतिम में अमृत निकला था। इसका अर्थ यह है कि पांच कर्मेंद्रियां, पांच जननेन्द्रियां तथा अन्य चार हैं:- मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार। अगर हम इन सभी पर नियंत्रण करने में कामयाब रहे। तभी हम सबको अपने जीवन में परमात्मा की प्राप्ति हो पाएगी।

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