Hindi Poem तलाश में हूं अपनी मगर… Talaash Me Hun Apni Magar

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Talaash Me Hun Apni Magar

तलाश में हूं अपनी मगर,

अब तक मैं नाकाम हूं,

ख़ुद को ख़ुद में ढूंढ़ रहा,

मैं ही मेरा मुकाम हूं।

माना मुझसे मेरी दूरियाँ,

ज्यादा ही कुछ बढ़ गईं

मैं ही अपनी चोट हूं,

मैं ही अपना ईनाम हूं।

मुझे मेरी कदर नहीं,

मुझसे ही मैं हैरान हूं,

मैं ही ख़ुद को मिटा रहा,

मैं ही ख़ुद की पहचान हूं।

क्या से क्या मैं हो गया,

कुछ तो बता ऐ ज़िदंगी,

किसका मैं सजदा करूं,

कैसे करूं मै बंदगी।

मेरा भी वो हुआ कहाँ,

जो तेरा भी हुआ नहीं,

मैं ढूंढ़ता उसे रहा,

जो कभी मुझे मिला नहीं।

कैसी है ये दिल्लगी,

कैसी ये उड़ान है,

मैं ही मुझमें कैद हूं,

मुझमें ही मेरा आसमान है…

Poem By:- अभिषेक त्रेहन (Abhishek Trehan)

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