Unknown Facts about "Mughal-E-Azam" in Hindi

मुगल-ए-आजम से जुड़े हैरान कर देने वाले तथ्य Unknown Facts about “Mughal-E-Azam”

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Unknown Facts about “Mughal-E-Azam” in Hindi: दोस्तों आज हम ऐसी शख्सियत की बात करेंगे जिसका आज भी बॉलीवुड में बोलबाला है। यह ओ फिल्म डायरेक्टर हैं जो सिर्फ 2 फिल्म बनाकर बॉलीवुड के बादशाह कहलाने लगे। इनके दो फिल्मों में से एक फिल्म वह है जिसका जब जब जिक्र होता है बॉलीवुड का सर फक्र से ऊंचा हो जाता है… फिल्म का नाम है mughal-e-azam और इस फिल्म के अजीम ओ शान शहंशाह डायरेक्टर थे करीमुद्दीन आसिफ, जिन्हें बहुत सारे लोग ‘के आसिफ’ (K. Asif) के नाम से भी जानते हैं।

के आसिफ(K. Asif) एक ऐसे जिद्दी इंसान थे की जो उन्होंने ठान लिया वह कर के दिखाते थे। फिर चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े, पीछे नहीं हटते थे। उनकी पहली फिल्म ‘फूल’ (Phool) जो की 1945 में रिलीज हुई थी। लेकिन यह फिल्म कुछ ज्यादा नहीं चल पाई। लेकिन जब उन्होंने दूसरी फिल्म बनाई तो उसने बॉलीवुड का इतिहास ही बदल डाला।

लेकिन यह काम आसान नहीं था। इन्होंने जो स्क्रिप्ट चुनी थी उस पर फिल्म बनाना आसान काम नहीं था, कोई और डायरेक्टर रहता तो शायद कंप्रोमाइज करके फिल्म पूरी कर भी लेता लेकिन इस बार कमान संभाली थी के आसिफ ने, तो कंप्रोमाइज का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था।

Mughal-e-azam फिल्म को बनने में 14 साल से ज्यादा का वक्त लग गया था। यह फिल्म शुरू हुई थी 1945 में जब अंग्रेजों का राज था और फिल्म तैयार हुई 1960 में। तो चलिए आज आपको अपने इस पोस्ट में बताते हैं इसी फिल्म से जुड़े यानी कि फिल्म mughal-e-azam से जुड़े कुछ अननोन फैक्ट्स के बारे में जिनके बारे में शायद बहुत कम लोगों को नहीं पता होगा।

Unknown Facts about “Mughal-E-Azam” in Hindi

Interesting Facts about Mughal-E-Azam in Hindi

के आसिफ ने इस फिल्म के लिए गीतकारों से मिलकर करीब 72 गाने लिखवाए थे इस फिल्म के लिए। यह उस वक्त की सबसे महंगी फिल्म मानी जाती है, इस फिल्म को उस वक्त बनने में 1.5 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। दोस्तों यह वह दौर था जब अच्छी से अच्छी फिल्म भी 10 से 15 लाख में बन जाया करती थी। भारतीय सिनेमा में यह फिल्म मील का पत्थर साबित हुई थी।

पहले यह फिल्म 1946 में चंद्रबाबू, डी के सप्रू, और नरगिस को लेकर बनाई जाने वाली थी। और इसकी शूटिंग ‘मुंबई टॉकीज’ में शुरू हुई हो गई थी। लेकिन उसी दौरान भारत और पाकिस्तान का पार्टीशन होने लगा, और फिल्म के प्रोड्यूसर सिराज को पाकिस्तान जाना पड़ा, जिसकी वजह से यह फिल्म बंद हो गई। और दोबारा शुरू हुई 1952 में नए प्रोड्यूसर और नए एक्टर्स के साथ।

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फिल्म mughal-e-azam में दमदार अभिनय करने वाले पृथ्वीराज कपूर दरअसल ‘के आसिफ’ के पहली पसंद नहीं थे। इस रोल के लिए ‘के आसिफ’ उस वक्त के मशहूर सुपरस्टार चंद्रमोहन को लेना चाहते थे। के आसिफ को उनकी आंखें बहुत पसंद थी। उनका कहना था कि अगर फिल्म बनेगी तो चंद्र मोहन के साथ बनेगी नहीं तो नहीं बनेगी। लेकिन कुछ ही समय के बाद एक एक्सीडेंट में चंद्रमोहन की आंखें चली गई।

के आसिफ इस फिल्म के म्यूजिक के लिए बहुत ही ज्यादा सीरियस थे। वह चाहते थे कि इस फिल्म का म्यूजिक ऐसा हो जो किसी ने आज तक नहीं सुना हो ना ऐसे गीत किसी ने लिखे हो। इसी सोच के साथ वह नोटों से भरा हुआ 1 ब्रीफकेस लेकर म्यूजिक डायरेक्टर नौशाद के पास पहुंचे। उन्होंने वह पैसों से भरा ब्रीफ़केस नौशाद के हाथों में थमा दिया और कहा कि आपको जितना पैसा चाहिए उतना मिलेगा लेकिन मुझे इस फिल्म के लिए बेहतरीन म्यूजिक चाहिए। लेकिन दोस्तों कहते हैं ना कि संगीतकार के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं होता। संगीत उनके लिए पूजा है, इबादत है, हालांकि आजकल ऐसा नहीं होता। लेकिन दोस्तों हम उस दौर की बात कर रहे हैं। नौशाद साहब को के आसिफ का यह अंदाज बहुत बुरा लगा और उन्होंने वह नोटों से भरा ब्रीफकेस खिड़की के बाहर फेंक दिया और बहुत ही ज्यादा नाराज हुए।

बाद में के आसिफ ने नौशाद साहब से इसके लिए माफी मांगी, और उनका माफी मांगने का अंदाज ही इतना निराला था की नौशाद साहब हंसकर मान गए। और वह इस फिल्म के लिए म्यूजिक बनाने के लिए तैयार भी हो गए।

डायरेक्टर वही होता है जो अपनी पूरी टीम को एक परिवार की तरह मानता हो। डायरेक्टर अपने एक्टर्स और टेक्नीशियन को जितनी अच्छी तरह से समझ पाएगा और जितने अच्छे से उनसे डील कर पाएगा फिल्म के लिए उतना ही अच्छा होगा।

इस फिल्म के एक सीन में ‘पृथ्वीराज कपूर’ को नंगे पांव रेत में चलना था। यह सीन राजस्थान में सूट होना था, और रेत बहुत ही ज्यादा गर्म थी। ‘पृथ्वीराज कपूर के पैरों में छाले पड़ गए थे। जब यह बात ‘के आसिफ’ को पता चली तो उन्होंने अपने जूते उतारे और नंगे पांव कैमरे के साथ साथ चलना शुरू कर दिया। शायद mughal-e-azam जैसी फिल्म बनाने के लिए ऐसे ही Passion और जुनून की जरूरत थी। और शायद यह जुनून के आसिफ में ही मौजूद था।

आज की फिल्मों में जब सैनिक, हाथी, घोड़े इन सब चीजों की जरूरत पड़ती है तो इनसब की सारी जिम्मेदारी BFX टीम सब कुछ अपने हाथों में ले लेती है। और डायरेक्टर को यह सब जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन यह फिल्म उस वक्त की है जब BFX नहीं हुआ करते थे।

यह हिंदुस्तान की पहली फिल्म थी जिसमें इंडियन आर्मी के हाथी घोड़ों और सैनिकों का इस्तेमाल किया गया था।

फिल्म mughal-e-azam के क्लाइमैक्स सीन के लिए जयपुर रेजीमेंट के सैनिकों का इस्तेमाल भी किया गया था।

यह सब करने के लिए उस वक्त के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन से परमिशन भी ली गई थी, और शूटिंग के वक्त खुद रक्षा मंत्री भी सेट पर मौजूद थे।

बमों की आवाज सुनकर कुछ हाथी इधर-उधर दौड़ने लगते थे, इसलिए कुछ हाथी जो आर्मी के नहीं थे, उन्हें अंधा कर दिया गया था। उस वक्त शायद यह पॉसिबल था, पर आज के समय में फिल्म की शूटिंग में किसी भी जंगली जानवर को नुकसान पहुँचाना भारतीय कानून के मुताबिक एक दंडनीय अपराध है।

के आसिफ एक नाम नहीं बल्कि एक पहचान है भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के लिए। उन्होंने एक ही फिल्म से वह शोहरत और वह मुकाम पाया है, जिसे पाने के लिए बड़े-बड़े फिल्म डायरेक्टर और एक्टर्स की पूरी जिंदगी लग जाती है।

 इस फिल्म के लिए ‘के आसिफ’ चाहते थे कि बड़े ‘गुलाम अली’ साहब से एक सॉन्ग गवाएं। पर प्रॉब्लम यह थी कि बड़े गुलाम अली साहब फिल्मों में गाना नहीं चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने ‘के आसिफ’ साहब को मना कर दिया। लेकिन आसिफ तो आसिफ थे, जब उन्होंने एक बार ठान लिया कि उन्हीं से गवाना है तो उनको कौन रोक सकता था।

के आसिफ ने बड़े गुलाम अली साहब से मिन्नतें की, रिक्वेस्ट की, इस फिल्म के लिए एक गाना वह गा दें। और नोटों से भरा ब्रीफ़केस लिए वह तैयार भी थे। लेकिन इस बार वह सतर्क थे, अपनी पिछली गलती को वह दोहराना नहीं चाहते थे। लेकिन वह बोल बोल कर बड़े गुलाम अली साहब से काफी रिक्वेस्ट की। प्लीज उनके लिए एक गाना गा दीजिए।

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आखिरकार जब गुलाम अली साहब ने सोचा की यह मानने वाला नहीं है तो उन्होंने सोचा कि एक ऐसी रकम बता देता हूं जिसे सुनकर यह खुद ही पीछे हट जाए। और फिर उन्होंने ‘के आसिफ’ से कहां की मैं इस गाने के लिए ₹25000 लूंगा। दोस्तों मैं यहां आपको बतला देना चाहूंगा की यह वह दौर था जब बड़े-बड़े सिंगर जैसे मोहम्मद रफी. लता मंगेशकर. किशोर कुमार भी एक गाने के लिए 200 रूपये 300 या फिर 500 रूपये लिया करते थे। ऐसे वक्त में उन्होंने 25000 रूपये की डिमांड की।

लेकिन यहां पर ‘के आसिफ’ ने जो बात गुलाम अली साहब जी को बोली वह दिल को छू लेने वाली बात थी। उन्होंने कहा गुलाम अली साहब आप बेशकीमती हैं, आपके हुनर की कोई कीमत नहीं लगा सकता। यह कहते हुए उन्होंने 10000 रुपये आसिफ जी ने उस गाने के लिए एडवांस के रुप में गुलाम अली साहब को दे दिए। इसके बाद गुलाम अली साहब के पास बोलने के लिए कुछ नहीं बचा। और आखिरकार उन्हें mughal-e-azam के लिए गाना गाना ही पड़ा।

आसिफ साहब ने सॉन्ग ‘प्यार किया तो डरना क्या’ के लिए और फिल्म के कुछ और सींस को कलर में शूट किया। इसके बाद उन्हें फिल्म और अच्छी लगने लगी। इसलिए वह चाहते थे कि पूरी फिल्म फिर से सूट हो, और कलर्ड हो। लेकिन फिल्म के प्रोडयूसर इसके लिए सहमत नहीं हुए, क्योंकि ऑलरेडी इस फिल्म को बनने में बहुत ज्यादा टाइम लग चुका था। और इस फिल्म में काफी पैसा भी खर्च हो चुका था।

दोबारा सूट होने पर इस फिल्म का बजट कहीं से कहां चला जाता, इसलिए प्रोड्यूसर्स ने ऐसा करने से मना कर दिया। इसलिए इस फिल्म को आधी कलर और आधी ब्लैक एंड वाइट में ही रिलीज करनी पड़ी।

फिल्म mughal-e-azam में दिलीप कुमार के बचपन का रोल तबला-वादक ‘जाकिर हुसैन’ को ऑफर किया गया था। जिसे बाद में निभाया था ‘जलाल आगा’ ने। दोस्तों यह जलाल आगा वही है जिन्होंने शोले फिल्म के महबूबा महबूबा गाने में दिखाई पड़ते हैं।

फिल्म mughal-e-azam के एक गाना ‘प्यार किया तो डरना क्या’ को सूट करने के लिए 10 लाख का खर्चा आया था। दोस्तों यह वह वक्त था जब 10 से 15 लाख रुपए में पूरी फिल्म बन जाया करती थी।

पूरे 105 गानों को रिजेक्ट करने के बाद नौशाद साहब ने इस गाने को( प्यार किया तो डरना क्या) सिलेक्ट किया था।

इस गाने के लिए जो धुन या फिर जो गूंज नौशाद साहब को चाहिए थी वह स्टूडियो में नहीं मिल पा रहा था, इसलिए इस सॉन्ग को लता मंगेशकर ने बाथरुम में गया था।

इसके बाद ‘ए मोहब्बत जिंदाबाद’ सॉन्ग में मोहम्मद रफी के साथ 100 सिंगर ने कोरस  गाया था।

इस फिल्म के कई स्क्रीनप्ले राइटर और डायलॉग राइटर्स में से एक थे जीनत अमान के पिता अमानुल्लाह खान।

यह फिल्म सिर्फ सूट के लिए याद नहीं की जाती है बल्कि इसकी शूटिंग के दौरान कलाकारों के निजी जिंदगी में भी काफी हलचल मची थी।

एक तरफ दिलीप कुमार और मधुबाला का ब्रेकअप हो चुका था। जिसका नतीजा यह था की पूरी फिल्म की शूटिंग के दौरान ही सिर्फ डायलॉग के जरिए ही वह बात किया करते थे। वरना पूरी फिल्म के शूटिंग के दौरान उन्होंने आपस में कोई बात नहीं की।

फिल्म अंदाज़ अपना अपना से जुड़े कुछ तथ्य 

इसके अलावा के आसिफ साहब ने दिलीप कुमार की बहन अख्तर बेगम के साथ शादी भी कर ली थी। लेकिन उनकी शादी सक्सेसफुल नहीं रही। जिसका नतीजा यह हुआ कि उनके घर में अक्सर झगड़े हुआ करते थे। जब बीच बचाव करने के लिए दिलीप कुमार उनके घर गए। तो आसिफ साहब ने कहा कि अपना स्टारडम मेरे घर के बाहर रखो। इस बात से दिलीप कुमार इतने नाराज थे की वह फिल्म mughal-e-azam के प्रीमियर पर भी नहीं आए। और फिल्म के रिलीज होने के 10 साल बाद उन्होंने mughal-e-azam फिल्म देखी।

फिल्म के एक सीन में खुशी का दौर था और इस सीन को जाहिर करने के लिए फर्श पर मोतिया गिरानी थी। तो आसिफ साहब चाहते थे कि मोतिया असली हो, उनका कहना था कि असली मोतियों की खनक और उसे देखकर जो आंखों में खुशी आती है वह नकली मोतियों से नहीं आ सकती। इसलिए असली मोतियों को जुटाने में  काफी वक्त लग गया, तब तक फिल्म की शूटिंग बंद रही।

फिल्म mughal-e-azam का सेट बहुत बड़ा था लेकिन दूसरे सींस के लिए लाहौर के शीश महल जैसा डुप्लीकेट सेट बनवाया गया था। लेकिन शीशे पर रिफ्लेक्ट होने की वजह से शूटिंग में दिक्कत आने लगी। इसके लिए ब्रिटिश डायरेक्टर डेविड लेन Devid Leen को भी बुलाया गया। लेकिन उन्होंने भी साफ मना कर दिया और बोले कि ऐसे सेट पर शूटिंग नामुमकिन है।

इसके बाद आसिफ ने पूरी टीम के साथ मिलकर सेट पर मोमबत्तियों की एक परत लगा दी। रिफ्लेक्शन की प्रॉब्लम तो हट गई लेकिन इससे विजुअल धुंधले होने लगे। इसके बाद सिनेमेटोग्राफर ‘डी माथुर’ ने शीशे पर झीना कपड़ा डालकर शूटिंग की।

इस भव्य सेट की शूटिंग के लिए 500 ट्रकों की हेडलाइट और 100 रिफ्लेक्टर इस्तेमाल करके फिल्म को शूट किया गया।

Mughal-e-azam इतने बड़े लेवल पर बनाई जा रही थी की इसके लिए काफी कुर्बानियां भी देनी पड़ी। इस फिल्म के डायरेक्टर ‘के आसिफ’ पूरी तरह से कर्ज में डूब चुके थे।

इस फिल्म के एक प्रोडूसर जो की ‘मोहम्मद अली जिन्ना’ के रिश्तेदार थे। उन्होंने जिन्ना का घर Tata के यहाँ गिरवी रख दिया था। और फिल्म ब्लॉकबस्टर होने के बाद भी उसे छुड़ाया नहीं, उसे कंपनी को दे दिया। यह घर आज भी मालाबार हिल्स में मौजूद है।

जब तक इस फिल्म की शूटिंग चलती रही इस फिल्म के डायरेक्टर ‘के आसिफ’ 10 साल तक ‘मोहन स्टूडियो’ में एक चटाई पर सोते थे। ऐसी तपस्या छुपी हुई है इस फिल्म को बनाने के पीछे।

दोस्तों आप इस फिल्म की पॉपुलैरिटी का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि, जब यह फिल्म रिलीज हुई तो इस फिल्म के टिकट्स के लिए 3,4 दिन तक लोग लाइन में लगे रहते थे। उनके घरवाले उनके लिए खाना लाते थे। उनका खाना, पीना, सोना सब लाइन में ही होता था।

इस फिल्म को देखने के लिए जैसे पूरा हिंदुस्तान एक साथ सिनेमा हॉल पर टूट पड़ा था।

फिल्म के टिकट के लिए दो काउंटर होते थे। 1 भारतीयों के लिए और एक उनके लिए जो दूसरे देश से इस फिल्म को देखने के लिए आए थे। उन्हें पासपोर्ट देख कर फिल्म का टिकट मिलता था। इसमें पाकिस्तान से आने वाले लोगों की संख्या ज्यादा होती थी।

Mughal-e-azam जब रिलीज हुई थी तब कहा गया था की फिल्म इंडस्ट्री के तारीख में किसी फिल्म को देखने के लिए ना ऐसा जुनून आंखों ने देखा और ना ही कभी देख पाएगा।

इस फिल्म के सक्सेस के बाद ‘के आसिफ’ ने संजीव कुमार के साथ ‘लव एंड गॉड’ नाम की फिल्म शुरू की। लेकिन यह फिल्म अधूरी रह गई क्योंकि इससे पहले ही इस महान शख्सियत की यानी ‘के आसिफ’ साहब की मौत हो गई।

तो दोस्तों यह थी कहानी एक डायरेक्टर की, उसकी फिल्म की, उसकी मेहनत की, उसकी लग्न की, उसके फिल्मों के प्रति फैशन की। जिसकी एक फिल्म ने उसे बुलंदियों पर पहुंचा दिया। लेकिन इस उपलब्धि के पीछे कि छिपा मेहनत, जद्दोजहद यह सब जानना आपके लिए जरूरी था। शायद यही सब सोचकर मैंने यह पोस्ट लिखा।

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