क्या फिल्मों में अश्लीलता दिखाना जरूरी है? Vulgarity in Bollywood Movies

क्या फिल्मों में अश्लीलता दिखाना जरूरी है? Vulgarity in Bollywood Movies

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Vulgarity in Bollywood Movies in Hindi: कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमारे देश को जिन क्षेत्रों में आगे बढ़ना चाहिए, या जिन क्षेत्रों में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए, उन चीजों को छोड़कर पता नहीं किन बेवजह और बे-फालतू की चीजों को प्रमोट करने में हम लगे पड़े हैं। क्योंकि दोस्तों हम यह पोस्ट फिल्मों से जुड़े मुद्दे पर लिख रहे हैं तो हम इसे फिल्म तक ही रखेंगे। Vulgarity in Bollywood Movies

Obscenity and Vulgarity in Bollywood Movies

वैसे तो देश में बहुत से चीजों को बढ़ावा दिया जा रहा है जो हमारे देश की संस्कृति, देश का इतिहास, जिसके लिए हम दुनिया भर में जाने जाते हैं। हमारी उस पहचान को धुंधली कर रहा है। हम बात कर रहे हैं फिल्मों में अश्लीलता की (Obscenity and Vulgarity in Bollywood Movies), फिल्मों में अश्लीलता किस हद तक होनी चाहिए। दोस्तों मेरे हिसाब से तो फिल्मों में अश्लीलता या वल्गैरिटी होनी ही नहीं चाहिए। हॉलीवुड की अच्छी फिल्मों की बात करें तो वहां पर भी जो सीन दिखाए जाते हैं ओ उनकी सोच और उनके दायरे में ही रहकर दिखाए जाते हैं। जिसे वल्गैरिटी नहीं बल्कि रोमांस कहना ज्यादा सही होगा। उसी तरह से हमें भी अपनी फिल्मों में अपनी संस्कृति के दायरे में रहकर ही रोमांस दिखाना चाहिए… वल्गैरिटी नहीं।

मैं मानता हूं की फिल्में एक माध्यम होती है लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का। और यदि फिल्म की स्क्रिप्ट में जरूरत है इस तरह के सीन को दिखाए जाने की, तो वह दिखाया जाना चाहिए, लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि आजकल की फिल्मों में सेक्स को जबरदस्ती घुसाने की कोशिश की जाती है, ना की फिल्म के डिमांड होती है। फिल्मों में इस तरह के सींस को यूज करना फिल्मों को बड़ा बनाती है। सबको लगता है कि अरे यह तो हॉलीवुड स्टाइल की फिल्म है मतलब की बड़ी फिल्म है…. पर मेरा सवाल यह है कि आजकल की बॉलीवुड फिल्मों में और “नेटफ्लिक्स” पर जो सीरीज आजकल चल रहे हैं उनकी एक अच्छे स्टोरीलाइन होने के बावजूद भी उन फिल्मों में ‘न्यूडिटी’ अर्थात ‘वल्गैरिटी’ ‘Vulgarity in Bollywood Movies’ को इतना ज्यादा वैल्यू क्यों दिया जाता है। उदाहरण के लिए बात करते हैं ‘नेटफ्लिक्स’ पर चल रहे ‘सीक्रेट गेम’ की….

इस सीरीज में ‘अनुराग कश्यप’ की टिपिकल “गैंग्स ऑफ वासेपुर” वाली छाप नजर आती है। ‘सीक्रेट गेम’ का डायलॉग से अच्छे हैं, डायरेक्शन अच्छा है, स्क्रीन प्ले अच्छा है, प्रेज़ेंटेशन अच्छा है, लेकिन इसमें ‘वल्गैरिटी’ को एक इंपॉर्टेंट पार्ट बनाना किस हद तक सही है। आजकल के फिल्मों में गाली-गलौज का इतना ज्यादा यूज़ हो रहा है, सिर्फ यह कहकर की यह तो ‘यूथ'(Youngster) की लैंग्वेज है। गलत एकदम गलत, हमारे यहां के यूथ हमारे यहां के यंगस्टर आज भी अपने परिवार के साथ गाली गलौज के साथ बात नहीं करते हैं। हमारे यहां की सभ्यता आज भी जिंदा है। तो फिर यह यूथ की लैंग्वेज कैसे हो गई? हो सकता है कि गिनती के लोग इस तरह से बात करते हो, तो फिर उन गिनती के लोगों के नाम पर पूरे यूथ को बदनाम करके इस तरह की फिल्में क्यों बनाई जा रही है?

कहते हैं कि सिनेमा समाज का दर्पण होता है, लेकिन क्या आपको लगता है कि आजकल की फिल्में उस नजरिए से बनाई जा रही है। जहां पर समाज को एक स्ट्रांग मैसेज मिले। अगर कुछ फिल्में कुछ अच्छे सब्जेक्ट पर बन भी रही हैं तो तो उन फिल्मों में भी कहीं ना कहीं ‘वल्गैरिटी’ को जगह मिल ही जाती है। Vulgarity in Bollywood Movies

‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ एक अच्छी स्क्रिप्ट एक अच्छे डायरेक्शन में बनी फिल्म थी। लेकिन  हम फिल्ममेकर से पूछते है की भैया इतनी गाली-गलौज करने की क्या जरूरत थी, तो उनका एक ही जवाब होता है कि फिल्म की स्क्रिप्ट के हिसाब से फिल्म जहां पर वेस्ट हैं, वहां के लोग इसी तरह से बात करते हैं। अरे भैया वहां ऐसे बात करते हैं तो करते होंगे, लेकिन अगर आप एक आध नेगेटिव चीज को फिल्म से हटा देंगे, तो उससे फिल्म पर क्या प्रभाव पड़ जाएगा। क्योंकि आपके कुछ ‘गाली-गलौज’ वाले लैंग्वेज को हटा देना से फिल्म का कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन फिल्म देखने वाले चार लोगों की सोच में बदलाव जरूर आएगा। लेकिन ‘अनुराग कश्यप’ जी को तो अपने आपको ‘एक्स्ट्राऑर्डिनरी डायरेक्टर’ साबित करना है तो कुछ तो अलग वह करेंगे ही।

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यहां तो फिर भी ‘सेंसर’ के नाम पर एक लगाम कसी हुई है लेकिन ‘नेटफ्लिक्स’ जैसी जगहों पर तो अपनी पूरी भड़ास निकालने शुरू कर दी है इस तरह की फिल्में। और इस तरह के सीरीज बनने लगे हैं तो लोग देखते भी हैं, और किसी भी चीज को बार बार दिखाई जाए तो लोग उसके साथ एडजस्ट कर ही लेते हैं। आज आप अगर कोई फिल्म में गाली सुनते हैं तो आपका ध्यान भी नहीं जाता है उस गाली पर, क्यों? क्योंकि फिल्मों में अब गालियां आम बात होने लगी है, लेकिन आजकल की फिल्मों में ऐसी नौबत आई क्यों?

आज हम सब को गाली-गलौज से भरी फिल्में भी नॉर्मल लगती है क्योंकि जब बॉलीवुड फिल्मों में इन सब चीजों की शुरुआत हुई थी अगर उसी वक्त सेंसर ने कठोर कदम लगा के इन फिल्मों पर लगाम लगा दी होती तो आज यह नोबत नहीं आती। दोस्तों अगर आप बहुत पुराने गानों की लिरिक्स को सुने तो वह भी आपको कहीं ना कहीं वल्गर लगेंगे। लेकिन उन सॉन्ग को दिखाने का एक ढंग हुआ करता था। म्यूजिक इतने दिल से बनाया जाता था, और इतने दिल से गाया जाता था कि सॉन्ग आपको वल्गर लगेगा भी नहीं और आप अपनी बात भी कह देंगे। Vulgarity in Bollywood Movies

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उदाहरण के लिए लता जी का एक बहुत ही पॉपुलर गाना “लग जा गले कि फिर यह हंसी रात हो ना हो…. दोस्तों इस सॉन्ग में कहा गया है कि “लग जा गले कि फिर यह हंसी रात हो ना हो…. नॉर्मल सी बात है की सिर्फ गले मिलने के लिए तो बुलाया नहीं जा रहा है, आगे भी बहुत कुछ होगा। लेकिन कितने तरीके और खूबसूरती के साथ यहां इस सॉन्ग में अपनी बात को पेश किया गया है। और इसमें कोई दो राय नहीं कि इसके सिंगर और म्यूजिक डायरेक्टर ने इस सॉन्ग को बॉलीवुड का “वन ऑफ द बेस्ट सॉन्ग” बना डाला है। बस यही चीज आज की फिल्मों या फिर आज के गानों में मिसिंग है।

कुछ फिल्ममेकर्स ‘यूथ और फेमिनिज्म’ के नाम पर इतनी ज्यादा ‘वल्गैरिटी’ फैला दी है कि अब उसे बटोर पाना मुश्किल सा हो गया है। जिस यूथ या नौजवान को इन सब चीजों से कुछ भी मतलब नहीं हुआ करता था, इन जैसे फिल्मों ने उन सभी को भी यह आदत लगा दी। अगर हम फिल्म ‘परमाणु’ और ‘वीरे दी वेडिंग’ को स्टडी करें तो शायद आपको पता ही होगा की ‘वीरे दी वेडिंग’ ‘परमाणु’ से कहीं ज्यादा कमाई की थी। क्यों? क्योंकि पिछले कुछ सालों में सेक्स, वल्गैरिटी, गाली-गलौज वाले लैंग्वेज और झूठे फेमिनिज्म नए फिल्मों और कुछ और माध्यम के द्वारा लोगों के दिमाग पर अपनी पकड़ बना ली है। अगर यही दो फिल्में 10 साल पहले बनी होती तो ‘परमाणु’ के आगे ‘वीरे दी वेडिंग’ पानी भर्ती नजर आती।

दोस्तों फिल्मों का स्तर गीरा सो गिरा, हमारी सोच का स्तर भी कम नहीं गिरा है। फेमिनिज्म के नाम पर वल्गैरिटी दिखाकर फिल्म मेकर्स अपनी जेब गर्म कर रहे हैं, और लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं। मुट्ठी भर, मैं कहता हूं मुट्ठी भर, भी ऐसी लड़कियां नहीं होगी इस देश में जिस तरह की लड़कियां इस फिल्म (वीरे दी वेडिंग) में दिखाई गई हैं। और फिल्म को यह कहकर प्रमोट किया गया था कि आजकल की लड़कियों को यही सब पसंद है। गलत है… फिलॉस्फर साहब, लड़कियों को आज भी यह सब पसंद नहीं है। लेकिन आप इस तरह की फिल्में बनाकर उन सबको इस तरफ आकर्षित जरूर कर रहे हैं। Vulgarity in Bollywood Movies

इस तरह की बेहूदा फिल्में बनाकर आप तो अपने घर में चादर ओढ़ कर सो जाएंगे, लेकिन बर्बाद कर जाएंगे नई जनरेशन को, नई पीढ़ी को। बहुत लोग मेरी इस बात से सहमत भी नहीं होंगे, सोच रहे होंगे अरे यह तो फिल्म है इंटरटेनमेंट का जरिया है फिल्म में रियल टच देने के लिए गाली गलौज जरूरी है। पर आपको यह सब अब नॉर्मल लगने लगा है जब से फिल्मों में गाली-गलौज आम सी बात हो गई है। क्या बिना गंदगी के फिल्में हिट नहीं होती? Hum aapke hain koun, Maine Pyar Kiya, Dilwale Dulhania Le Jayenge जैसे कई फिल्में परफेक्ट एग्जांपल है कि बिना गंदगी दिखाएं भी फिल्में हिट होती हैं, लोगों को पसंद आती हैं। क्या आपको नहीं लगता की इन फिल्मों में भी सेक्स सीन डाले जा सकते थे। अगर नहीं यकीन है तो आप ‘अनुराग कश्यप’ जैसे डायरेक्टर को बोलिए कि “हम आपके हैं कौन” फिल्म को अपने स्टाइल में बनाएं। अगर उन्होंने इस साफ-सुथरी फिल्म को “सीक्रेट-गेम” ना बना डाला तो कहिएगा।

कहने का मतलब यह हुआ कि बेवजह ही इन सब चीजों को फिल्मों में घुसाया जा रहा है। एक फिल्म मेकर ही होता है जो कि इन सब चीजों के बिना भी एक साफ-सुथरी अच्छी और एंटरटेनिंग फिल्म बना सकता है। कहां गए वह दिन, जब एक पूरी फैमिली साथ में बैठकर TV पर फिल्म देखा करती थी। कहां गए वो दिन जब छुट्टी के दिनों में पूरा परिवार एक साथ थिएटर में फिल्में देखने जाया करती थी। आज अगर आप अपनी फैमिली के साथ थिएटर में फिल्म देखने जाते हैं तो आपको एक घुटन सी होने लगेगी। यह देखकर कि कहीं फिल्म में कोई वल्गर सीन आ जाए, आपको शर्मिंदगी महसूस होगी। आपके साथ आपकी मां फिल्म देख रही हो और सामने पर्दे से आपको मां की गाली ही सुननी पड़ी हो।

दोस्तों बॉलीवुड वेस्टर्न कल्चर को फॉलो करने में लगी पड़ी है। हॉलीवुड की टेक्निक, उनकी सोच, उनकी स्क्रिप्ट को कॉपी करने में तो जीरो हैं। लेकिन वहां की गंदगी को यहां के फिल्मों में शामिल करने की होड़ सी लगी हुई है। अरे कॉपी करना ही है तो उनके फिल्में बनाने की टेक्निक को कॉपी करो। ‘मिशन इंपॉसिबल’ जैसी फिल्में कैसे बनाई जाए उसे कॉपी करो, ‘इंसेप्शन’ जैसी फिल्में बॉलीवुड में कैसे बने इन पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन नहीं वहां नंगापन कैसे दिखाया जाता है, उसे कॉपी जरूर करेंगे। अरे वह उनका कल्चर है वह अपने कल्चर के अंदर रहकर फिल्में बनाते हैं। हम अपने कल्चर अपनी संस्कृति के दायरे में रहकर फिल्में क्यों नहीं बनाते। Vulgarity in Bollywood Movies

हमारी बॉलीवुड की फिल्मों में शुरू से ही गाने होते हैं, इसे हॉलीवुड वाले क्यों नहीं कॉपी करते हैं। हमें इस चीज को हमें समझना पड़ेगा। सौ बात की एक बात है क्योंकि हम सब ऐसी फिल्में देखते हैं, इसलिए यह लोग ऐसी फिल्में बनाते हैं। सिंपल यह मेरी अपनी राय है… मेरी बात से आप सहमत भी हो सकते हैं और नहीं भी।

इस पोस्ट के माध्यम से मेरी बस यही कोशिश है कि इस तरफ भी ध्यान दिया जाना चाहिए, और अनुराग कश्यप और उनके जैसे फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर को अपने दायरे में रहकर ही फिल्में बनानी चाहिए। और अगर ऐसा नहीं करते हैं तो हॉलीवुड का रास्ता तो उनके लिए खुला ही हैं, वहां जाकर वह अपने मनमुताबिक फिल्में बनाते रहें।

जो लोग मेरी बातों से सहमत हैं वह मेरे इस पोस्ट “Obscenity and Vulgarity in Bollywood Movies” को शेयर जरूर करें। क्योंकि इससे फिल्म मेकर्स में कुछ बदलाव आए या ना आए, लेकिन हम सबके अंदर कुछ बदलाव जरूर आना चाहिए। धन्यवाद॥

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