ठंढ की चुभन Winter Season Poem in Hindi

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Winter Season Poem in Hindi

ठंढ की चुभन

सफेद चादर में लिपटी कोहरे की धुंध

ले आई ठंड की कैसी चुभन,

कोहराम करती वो सर्द हवाएं

छोड़ जाती बर्फ से ठंडी सिहरने,

कोहरे का साया भी ऐसा गहराया

सूरज की लाली भी ना बच पाया,

अंधेरा घना जब धुंधलालाया

रात के सन्नाटों ने ओस बरसाया,

कैसी कहर ये ठंड की पड़ी

जहां देखो दुबकी पड़ी है जिंदगी,

अमीरों के अफसानों के ठाठ हजार

गरीबी कम्बलों से निहारती दांत कटकटाती,

ठिठुरती कपकपाती सर्द रातों में

आग की दरस की प्यासी निगाहें,

याद आती है अंगूठी के इर्द-गिर्द

चाय की चुस्कियां लेती हो मजलिसे,

तन को बेचैन करती कोहरे ओढ़ें

आती सुबह शुष्क हवाओं संग,

कैसी कहर ये ठंड की पड़ी

जहां देखो दुबकी पड़ी है जिंदगी।

 

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