क्यों यमराज को लेना पड़ा था विदुर रुप में अवतार Yamraj And Vidura Story in Mahabharata

Yamraj And Vidura Story in Mahabharata

Yamraj And Vidura Story in Mahabharata in Hindi:

आज हम आपको अपने इस पोस्ट में बतला रहे हैं कि आखिर क्यों को लेना पड़ा था यमराज को विदुर के रूप में अवतार? Yamraj And Vidura Story in Mahabharata दोस्तों यह घटना उस समय की है जब मैत्रेय जी से विदुर जी मिले थे। तब महात्मा विदुर ने मैत्रेय जी से पूछा कि, आप मुझे बताइए, कि मैं कौन हूं? तब मैत्रेय जी ने विदुर से कहा कि तुम यमराज के अवतार हो। और मांडव्य ऋषि के श्राप के कारण तुमको महाभारत काल में एक दासी पुत्र विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा है। इसकी कथा कुछ इस प्रकार है…..

एक बार कुछ चोरों ने राजकोश से धन की चोरी कर ली। जब राज्य सैनिकों को चोरी का पता चला तो यह चोर की खोज में भागे। और चोरों का पीछा किया। सैनिकों को अपने पीछे भागता देख चोर घबरा गए। चोर धन के साथ ज्यादा दूर भाग नहीं सकते थे। इसलिए चोरों ने मार्ग में मिले मांडव्य ऋषि के आश्रम में अपना चोरी का धन छुपा दिया। और वहां से यह सब भाग गए। Yamraj And Vidura Story in Mahabharata

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चोरों का पीछा करते हुए सैनिक मांडव्य ऋषि के आश्रम में आ पहुंचे। और मांडव्य ऋषि के आश्रम की तलाशी ली। छानबीन करने के बाद सैनिकों को मांडव्य ऋषि के आश्रम से चोरी का धन बरामद हो गया। उस वक्त मांडव्य ऋषि अपने ध्यान में थे। राज्य कर्मचारियों की भागदौड़ की आवाज से मांडव्य ऋषि का ध्यान भंग हो गया। राज्य कर्मचारियों ने मांडव्य ऋषि को ही चोर समझ लिया। और उन्हें पकड़ कर राजा के पास ले गए। राजा ने मांडव ऋषि को फांसी की सजा सुना दी।

मांडव्य ऋषि को फांसी देने वाली स्थान पर लाया गया। मांडव्य ऋषि वहीं पर गायत्री मंत्र का जाप करने लगे। राज्य कर्मचारी जब मांडव्य ऋषि को फांसी देते, तो उन्हें फांसी नहीं लगती, राज्य के सभी कर्मचारी सहित राजा भी यह देख कर हैरान हो गया। कि ऐसा क्यों हो रहा है? फांसी से तो आज तक कोई नहीं बचा, लेकिन इस ऋषि को फांसी क्यों नहीं लग रही है? इसका क्या कारण है? Yamraj And Vidura Story in Mahabharata

तब राजा ने सोचा निश्चित ही यह कोई महान तपस्वी हैं। तब  राजा को पश्चाताप हुआ और  राजा ने ऋषि माण्डव्य से क्षमा याचना मांगी। तब राजा से मांडव्य ऋषि ने कहा, राजन मैं तुम्हें तो क्षमा कर दूंगा। लेकिन मैं इस बात के लिए यमराज को कभी क्षमा नहीं करूंगा। मैं यमराज से पूछूंगा कि आखिर क्यों मुझे मृत्युदंड की सजा दिया गया?

जब मैंने कोई पाप ही नहीं किया था, तो मुझे यह सजा क्यों मिली? मैं इसके लिए न्यायाधीश यमराज को दंड दूंगा।

अपने तपोबल से मांडव्य ऋषि यमराज की सभा में पहुंच जाते हैं। और वहां पहुंच कर यमराज से पूछते हैं। यमराज जब मैंने कोई पाप नहीं किया था, तो मुझे मृत्यु दंड क्यों दिया गया?

ऋषि ने कहा मेरे किस पाप का दंड आपने मुझे मृत्युदंड के रूप में दिया। मांडव्य ऋषि के पूछने पर यमराज भी हिल गए। यमराज ऋषि से नहीं डरे। वह डरे ऋषि की तप साधना से। तप से ऋषियों की देह और वचन पवित्र हो जाते हैं। इसलिए ऋषि जो भी कह देते हैं, वह हो जाता है। दोस्तों तप, व्यक्ति को पवित्र करता है। भगवान की भक्ति ही आदमी को पवित्र करती है। माण्डव्य ऋषि के प्रश्न सुन यमराज जी कांप गए….

तब यमराज जी ऋषि मांडव्य से बोले, “ऋषिवर, जब आप 3 वर्ष के थे, तो आपने एक तितली को कांटा चुभोया था… उसी पाप के कारण आपको मृत्युदंड की सजा मिली थी।

फिर यमराज जी आगे बोले, जाने-अनजाने जो भी पाप किया जाए, उसका दंड तो भुगतना ही पड़ता है। परमात्मा (भगवान) को पुण्य तो अर्पित किया जा सकता है, लेकिन पाप नहीं।

तब मांडव्य ऋषि ने कहा… शास्त्र के अनुसार यदि कोई भी अज्ञानवश कोई पाप करता है। तो उसका दंड उसे स्वप्न में दिया जाना चाहिए। लेकिन आपने शास्त्र के विरोध निर्णय किया। अज्ञानतावश किए गए मेरे पाप का फल आपने मुझे मृत्युदंड के रूप में दिया। आपको मेरे उस अज्ञानतावश हुए पाप का दंड मुझे सपने में देना चाहिए था। Yamraj And Vidura Story in Mahabharata

यमराज तुमने मुझे गलत ढंग से शास्त्र के विरुद्ध दंड दिया है। यह तुम्हारी अज्ञानता है, इसी अज्ञानता के कारण ही, मैं तुम्हें भी श्राप देता हूं कि तुम महाभारत काल में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लो और मनुष्य योनि में जाओ।

मैत्रेय जी विदुर से कहते हैं… की बस विदुर, इसी कारण ही तुम्हें मनुष्य योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ा। तुम कोई साधारण मनुष्य नहीं हो, तुम स्वयं यमराज के अवतार हो। भगवान का बनाया गया धर्म कहता है, कि यदि कोई किसी की उंगली काटेगा तो उसकी उंगली भी एक दिन कटेगी। कोई किसी की हत्या करेगा तो उसकी भी एक दिन हत्या होगी। यही शाश्वत सत्य है। यही नियम है।

बचपन में ऋषि मांडव्य ने, तितली को काटा चुभोया था इसलिए उन्हें सूली पर चढ़ना पड़ा था। यदि तितली मर जाती तो, ऋषि मांडव्य को भी मरना पड़ता।

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